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| मोबाइल की लत को छोड़ता हुआ नव युवक |
क्या आप भी मोबाइल स्क्रीन के गुलाम बन चुके हैं? (एक कड़वी सच्चाई)
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप अपने ऑफिस का या पढ़ाई का कोई बहुत जरूरी काम कर रहे हों, और अचानक आपके फोन की स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन लाइट ब्लिंक करती है? आप सोचते हैं कि "बस एक सेकंड लगेगा, देख लेता हूं किसका मैसेज है।" आप फोन उठाते हैं, व्हाट्सएप चेक करते हैं, और फिर आपकी उंगलियां अपने आप इंस्टाग्राम या यूट्यूब के आइकन पर चली जाती हैं। आप रील्स या शॉर्ट्स के उस अंतहीन कुएं में गिर जाते हैं। जब आप अपनी आंखें स्क्रीन से हटाकर घड़ी देखते हैं, तो आपको एहसास होता है कि आपका एक पूरा घंटा या उससे भी ज्यादा समय बर्बाद हो चुका है।
उस समय आपको अंदर से बहुत बुरा लगता है। आपको खुद पर गुस्सा आता है, एक अजीब सा गिल्ट (अपराधबोध) महसूस होता है। आप खुद से एक पक्का वादा करते हैं कि "बस, बहुत हो गया, अब फोन साइड में रख दूंगा और अपना काम करूंगा।" लेकिन दुख की बात यह है कि अगले 20 मिनट के अंदर, आपका हाथ फिर से उसी स्क्रीन को टटोल रहा होता है। अगर यह कहानी आपकी अपनी जिंदगी से मेल खाती है, तो आपको घबराने या खुद को कोसने की जरूरत नहीं है। आप इस दुनिया में अकेले नहीं हैं। आज के डिजिटल युग में हर दूसरा इंसान, चाहे वह बच्चा हो, जवान हो या बुजुर्ग, इसी भयंकर परेशानी से जूझ रहा है।
यह सिर्फ एक 'खराब आदत' या टाइमपास नहीं है। यह आपके दिमाग के साथ खेला जा रहा एक बहुत बड़ा और खतरनाक मनोवैज्ञानिक खेल है। लोग अक्सर रातों को जागकर गूगल पर सर्च करते हैं कि "मोबाइल की लत कैसे छोड़ें" या "फोन की लत से छुटकारा कैसे पाएं"। इसका सीधा सा कारण यह है कि यह लत हमारी आंखों की रोशनी, हमारी रातों की सुकून भरी नींद, हमारी सोचने-समझने की क्षमता और हमारे करियर के फोकस को दीमक की तरह पूरी तरह से निगल रही है। इस आर्टिकल में हम सिर्फ मोटिवेशन वाली हवा-हवाई बातें नहीं करेंगे। हम गहराई में जाकर समझेंगे कि यह लत आखिर लगती क्यों है, और एक प्रक्टिकल 'डोपामाइन डिटॉक्स' (Dopamine Detox) के जरिए इस लत को हमेशा के लिए जड़ से कैसे खत्म किया जा सकता है।
मोबाइल की लत और डोपामाइन (Dopamine) का असली विज्ञान
मोबाइल की लत को गहराई से समझने के लिए आपको सबसे पहले अपने दिमाग के एक बेहद खास और ताकतवर केमिकल को समझना होगा, जिसे विज्ञान की भाषा में 'डोपामाइन' (Dopamine) कहते हैं। इसे आप आम बोलचाल में 'खुशी का केमिकल', 'रिवॉर्ड केमिकल' या 'मोटिवेशन मॉलिक्यूल' भी कह सकते हैं।
इंसान का दिमाग इस तरह से डिजाइन किया गया है कि जब भी आप कोई ऐसा काम करते हैं जो आपके लिए फायदेमंद है या जिसमें आपको मजा आता है—जैसे जब आप अपना पसंदीदा स्वादिष्ट खाना खाते हैं, कोई बहुत अच्छा गाना सुनते हैं, या फिर किसी खेल में जीत हासिल करते हैं—तो आपका दिमाग इनाम के तौर पर यह डोपामाइन रिलीज करता है। जब डोपामाइन निकलता है, तो आपको अंदर से एक बहुत ही अच्छा और संतुष्ट एहसास होता है। आपका दिमाग इस फीलिंग को याद रखता है और चाहता है कि आप वह काम बार-बार करें ताकि उसे वह 'खुशी' दोबारा मिल सके। इसे और गहराई से समझने के लिए आप पढ़ सकते हैं कि कैसे नशे की लत और डोपामाइन ट्रैप कैसे दिमाग को कंट्रोल करता है, जो आपको बताएगा कि हर तरह की लत का पैटर्न एक जैसा ही होता है।
टेक्नोलॉजी कंपनियां हमारे दिमाग को कैसे 'हैक' करती हैं?
आजकल के सोशल मीडिया ऐप्स और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म्स (जैसे इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, फेसबुक वॉच) को दुनिया के सबसे स्मार्ट इंजीनियर्स और मनोवैज्ञानिकों ने मिलकर इसी तरह डिजाइन किया है कि वे आपके दिमाग में बिना कोई मेहनत किए बार-बार डोपामाइन का स्पाइक (उछाल) ला सकें। यह बिल्कुल कसीनो (Casino) में रखी स्लॉट मशीन की तरह काम करता है।
जब आप स्क्रीन पर उंगली रखकर नीचे की तरफ रील स्क्रॉल करते हैं, तो हर 15 या 30 सेकंड में आपको एक बिल्कुल नया और अप्रत्याशित (unexpected) कंटेंट मिलता है। कभी कोई हंसाने वाली कॉमेडी आ जाती है, कभी कोई खूबसूरत डांस वीडियो, तो कभी कोई ज्ञान की बात। आपके दिमाग को पहले से बिल्कुल भी नहीं पता होता कि अगली ही रील में क्या आने वाला है। यह जो 'सस्पेंस', 'सरप्राइज' और 'नयापन' है, यही आपके दिमाग में बार-बार डोपामाइन की बारिश करवाता है।
धीरे-धीरे आपके दिमाग को इस हाई-लेवल और बिना मेहनत वाले डोपामाइन की एक बुरी आदत पड़ जाती है। यही एकमात्र कारण है कि जब आप अपनी असली जिंदगी में वापस लौटते हैं और कोई ऐसा काम करने की कोशिश करते हैं जिसमें थोड़ा ज्यादा समय और मेहनत लगती है (जैसे 2 घंटे पढ़ाई करना, कोई प्रोजेक्ट पूरा करना), तो आपको भयंकर बोरियत (boredom) और चिड़चिड़ापन महसूस होता है। आपका दिमाग तुरंत उसी आसान डोपामाइन की मांग करने लगता है, और आप बिना सोचे-समझे मशीन की तरह मोबाइल उठा लेते हैं। अगर आप जानना चाहते हैं कि शुरुआत में कोई भी लत कैसे लगती है, तो इसके पीछे भी यही डोपामाइन का विज्ञान काम करता है।
रील स्क्रॉलिंग कैसे आपके दिमाग और भविष्य को पूरी तरह से खोखला कर रही है?
शायद आपको अभी भी लग रहा हो कि दिन में बस एक-दो घंटे रील्स देखने से क्या ही नुकसान हो जाएगा। लेकिन हकीकत में, यह रील स्क्रॉलिंग सिर्फ आपका कीमती समय बर्बाद नहीं कर रही है, बल्कि यह आपके दिमाग की पूरी न्यूरोलॉजिकल वायरिंग और उसके काम करने के तरीके को ही बदल रही है। जिस तरह कोई भी केमिकल एडिक्शन दिमाग को सुन्न करता है, जिसे आप किसी भी प्रकार के नशे का दिमाग पर क्या असर होता है इस लेख में विस्तार से समझ सकते हैं, ठीक उसी तरह यह डिजिटल एडिक्शन भी काम करता है।
1. फोकस और अटेंशन स्पैन (ध्यान लगाने की क्षमता) का पूरी तरह खत्म होना
क्या आपने कभी यह बात नोटिस की है कि आज से कुछ साल पहले आप कोई लंबी फिल्म आराम से देख लेते थे? लेकिन आज, आप 10 मिनट का वीडियो भी बिना 2x की स्पीड किए नहीं देख पाते। ऐसा इसलिए है क्योंकि 15-30 सेकंड की रील्स ने आपके अटेंशन स्पैन (लंबे समय तक किसी एक चीज पर ध्यान टिकाए रखने की क्षमता) को लगभग खत्म करके 8 सेकंड से भी कम कर दिया है। आपका दिमाग अब लंबे समय तक एक ही जगह पर फोकस नहीं कर पाता है। इसका सीधा असर आपकी पढ़ाई और जॉब पर पड़ता है।
2. FOMO (Fear Of Missing Out) का लगातार बढ़ना
FOMO यानी कुछ छूट जाने का डर। सोशल मीडिया ने हमारे अंदर यह डर भर दिया है कि अगर हमने 2 घंटे तक इंटरनेट नहीं खोला, तो शायद दुनिया में कुछ ऐसा हो जाएगा जो हमें पता नहीं चलेगा। दोस्तों की पार्टी की फोटो, कोई नई वायरल रील, या कोई मीम—यह डर हमें बार-बार अपना फोन अनलॉक करने पर मजबूर करता है। यह एक मानसिक तनाव है जो आपको कभी शांत नहीं बैठने देता।
3. हीन भावना (Inferiority Complex) और डिप्रेशन
लोग अपनी जिंदगी का सिर्फ सबसे बेहतरीन हिस्सा (Highlights) ही इंटरनेट पर दिखाते हैं। उनके पीछे के संघर्ष या दुख कोई पोस्ट नहीं करता। जब आप लगातार दूसरों की महंगी छुट्टियां, ब्रैंडेड कपड़े, और खुशहाल तस्वीरें देखते हैं, तो आप अपनी सामान्य जिंदगी की तुलना उनकी 'फिल्टर्ड' जिंदगी से करने लगते हैं। इससे आपके अंदर यह हीन भावना पैदा होती है कि "मैं पीछे रह गया हूं", जो धीरे-धीरे डिप्रेशन और एंग्जायटी का रूप ले लेती है।
4. समय की भयानक बर्बादी और शारीरिक नुकसान
यह सबसे बड़ा और नुकसानदेह पहलू है। इंसान का समय ही उसकी पूंजी है। जो समय आपको अपने स्किल्स सुधारने में, परिवार के साथ बिताने में, या अपनी सेहत पर ध्यान देने में लगाना चाहिए था, वह सारा समय आप दूसरों की जिंदगी देखने में बर्बाद कर रहे हैं। इसके अलावा, लगातार नीचे की तरफ देखने से गर्दन में दर्द (Text Neck Syndrome) और आंखों में भारीपन की समस्या हर युवा में आम हो गई है। जब दिन खत्म होता है, तो हाथ में सिर्फ शारीरिक थकान और दिमाग में गहरा पछतावा बचता है।
7 दिन का प्रक्टिकल डोपामाइन डिटॉक्स (Dopamine Detox) प्लान: लत से बाहर कैसे आएं?
अब जब आप विज्ञान के जरिए समझ चुके हैं कि यह लत कितनी खतरनाक है, तो सवाल यह उठता है कि इससे हमेशा के लिए बाहर कैसे आएं? इसका सबसे असरदार तरीका है—एक सख्त डोपामाइन डिटॉक्स (Dopamine Detox)।
डोपामाइन डिटॉक्स का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको हमेशा के लिए स्मार्टफोन फेंक देना है या समाज से पूरी तरह कट जाना है। इसका असली मतलब है—अपने दिमाग को 'रीसेट' (Reset) करना। यह आपके दिमाग के उस रिवॉर्ड सिस्टम को फिर से नॉर्मल करने की प्रक्रिया है, ताकि वह मेहनत वाली चीजों में (जैसे किताब पढ़ना या काम करना) दोबारा खुशी ढूंढ सके। यहां 7 दिन का एक बेहद प्रक्टिकल प्लान दिया गया है, जिसे आप आज से ही शुरू कर सकते हैं।
दिन 1 और दिन 2: ट्रैकिंग (Tracking) और अपने 'ट्रिगर्स' की गहरी पहचान
शुरुआत के दो दिनों में आपको अचानक से अपना फोन बंद नहीं करना है या कुछ भी छोड़ना नहीं है। आपको सिर्फ अपने दुश्मन को समझना है। अपने फोन की सेटिंग्स में जाएं और 'डिजिटल वेलबीइंग' (Digital Wellbeing) या 'स्क्रीन टाइम' का ऑप्शन खोल कर चेक करें। ईमानदारी से देखें कि आप पूरे दिन में कितने घंटे फोन चलाते हैं, और कौन से ऐप पर आपका सबसे ज्यादा समय बर्बाद होता है। इसे एक पेपर पर लिख लें।
इसके साथ ही, अपने 'ट्रिगर्स' को पहचानने की कोशिश करें। ट्रिगर का मतलब है वह एहसास जो आपको अपना फोन उठाने पर मजबूर करता है। क्या आप तब फोन उठाते हैं जब आप काम से बोर होते हैं? क्या स्ट्रेस होने पर रील देखते हैं? या टॉयलेट में जाते समय फोन ले जाते हैं? इन कारणों को डायरी में लिखें। जब तक आपको ट्रिगर नहीं पता होगा, आप लत नहीं छोड़ सकते।
दिन 3 और दिन 4: डिजिटल सफाई (Digital Declutter) और नोटिफिकेशन्स बंद करना
तीसरे दिन आपको अपने फोन की बहुत गहरी सफाई करनी है। यह सबसे जरूरी कदम है। उन सभी फालतू ऐप्स को डिलीट (Uninstall) कर दें जिनका आपने पिछले एक महीने से कोई इस्तेमाल नहीं किया है। अपने होम स्क्रीन को बिल्कुल साफ-सुथरा रखें। सिर्फ काम के ऐप्स (जैसे कैलेंडर, नोट्स, कॉलिंग) ही होम स्क्रीन पर रखें। सोशल मीडिया ऐप्स को किसी अंदर के फोल्डर में छिपा दें।
चौथे दिन, सबसे जरूरी काम करें—व्हाट्सएप (जरूरी चैट्स) और कॉलिंग को छोड़कर बाकी सभी ऐप्स (खासकर इंस्टाग्राम, यूट्यूब, और गेम्स) के नोटिफिकेशन्स पूरी तरह से बंद (Turn Off) कर दें। याद रखें, आपका फोन हर बार 'टिंग' की आवाज करके आपके दिमाग को बुलाता है। जब आपका फोन कोई आवाज ही नहीं करेगा, तो आपका दिमाग बार-बार फोन चेक करने के लिए ललचाएगा नहीं।
दिन 5 और दिन 6: बाउंड्रीज सेट करना (No-Phone Zones) और नींद को बचाना
अब समय है अपनी जिंदगी में कुछ स्पष्ट नियम बनाने का। अपने घर में कुछ 'नो-फोन जोन्स' तय करें। सबसे पहला नियम बनाएं कि डाइनिंग टेबल पर खाना खाते समय कोई भी फोन नहीं चलाएगा। दूसरा नियम बनाएं कि बाथरूम में फोन लेकर बिल्कुल नहीं जाना है।
छठे दिन, अपने सोने के कमरे (Bedroom) को पूरी तरह से फोन-मुक्त बनाएं। सोने से कम से कम एक घंटा पहले अपने फोन का इंटरनेट बंद कर दें और उसे बिस्तर से दूर रख दें। रात की अच्छी नींद आपके दिमाग के लिए दवा का काम करती है। अगर आपको शुरुआत में फोन के बिना सोने में दिक्कत आती है, तो आप लत छोड़ने के बाद रात को अच्छी नींद लाने के तरीके अपना सकते हैं, जो किसी भी प्रकार की रिकवरी में बहुत कारगर हैं। सुबह उठने के लिए फोन की जगह असली अलार्म घड़ी का इस्तेमाल करें।
दिन 7: नई और असली आदतों (Real Habits) को अपनाना
सातवें दिन तक आप नोटिस करेंगे कि आपके दिमाग का डोपामाइन लेवल काफी हद तक नॉर्मल होने लगा है। चिड़चिड़ापन थोड़ा कम हो गया है। लेकिन अब आपके सामने एक नया चैलेंज आएगा—खाली समय। अब आपको उस खाली समय को किसी अच्छी चीज से भरना है जो पहले आप घंटों तक रील देखकर बर्बाद करते थे। अगर आप इसे नहीं भरेंगे, तो आप वापस उसी लत में पड़ जाएंगे।
इस खाली समय का इस्तेमाल कुछ ऐसा करने में करें जिससे आपको असली और गहरी खुशी मिले। मोटिवेशनल किताब पढ़ें, खुली हवा में वॉक करें, परिवार के साथ बातें करें, या अपनी कोई पुरानी हॉबी (जैसे पेंटिंग या कुकिंग) दोबारा शुरू करें। यह आपके दिमाग को 'असली डोपामाइन' देगा।
मोबाइल की लत हमेशा के लिए दूर रखने की 4 बेहतरीन टिप्स
7 दिन के इस कड़े डिटॉक्स के बाद भी आपको कुछ सावधानियां बरतनी होंगी:
- ग्रेस्केल मोड (Grayscale Mode): अपने फोन की डिस्प्ले सेटिंग में जाकर अपनी स्क्रीन को ब्लैक एंड व्हाइट कर दें। रंग-बिरंगी स्क्रीन दिमाग को आकर्षित करती है। बेरंग स्क्रीन दिमाग को बोरिंग लगती है और आप काम की चीजें ही देखते हैं।
- ऐप टाइमर (App Timer) लगाएं: अगर सोशल मीडिया देखना ही है, तो लिमिट सेट करें। सोशल मीडिया ऐप्स के लिए 30 मिनट का डेली टाइमर सेट करें। समय खत्म होते ही ऐप लॉक हो जाएगा।
- आंखों के लिए 20-20-20 का नियम: लगातार स्क्रीन देखने से आंखें खराब होती हैं। हर 20 मिनट में, स्क्रीन से नजर हटाकर 20 फीट दूर रखी किसी चीज को 20 सेकंड तक लगातार देखें।
- वीकेंड डिटॉक्स (Weekend Detox): हफ्ते में एक दिन (जैसे रविवार) ऐसा तय करें जब आप आधा दिन अपने फोन को स्विच ऑफ रखेंगे या इंटरनेट बंद रखेंगे। इसे अपना 'डिजिटल हॉलिडे' मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण सवाल (FAQ)
1. डोपामाइन डिटॉक्स (Dopamine Detox) करने में दिमाग को पूरी तरह से नॉर्मल होने में कितने दिन लगते हैं?
वैसे तो 7 दिन के डिटॉक्स प्लान से आपको अपने व्यवहार में पॉजिटिव बदलाव महसूस होने लगेगा, लेकिन विज्ञान के अनुसार दिमाग की न्यूरल वायरिंग (Neural Wiring) को पूरी तरह से रीसेट होने और पुरानी आदतों को भूलने में 21 से 30 दिन तक का समय लग सकता है। इसलिए लगातार कोशिश करते रहें।
2. क्या मुझे अपने सारे सोशल मीडिया अकाउंट हमेशा के लिए डिलीट कर देने चाहिए?
नहीं, ऐसा करना बिल्कुल भी जरूरी नहीं है। सोशल मीडिया एक टूल (Tool) है, हमें इसे अपने फायदे और कनेक्शन के लिए इस्तेमाल करना है, न कि खुद को इसका गुलाम बनाना है। अकाउंट डिलीट करने के बजाय इसके इस्तेमाल का समय (App timer) तय करें और सिर्फ काम की चीजें देखें।
3. मुझे रात को बिस्तर पर बिना फोन देखे नींद नहीं आती, तो मैं क्या करूं?
शुरुआत के 3-4 दिनों में ऐसा महसूस होना बिल्कुल नॉर्मल है (इसे विड्रॉल सिम्पटम कहते हैं)। फोन की स्क्रीन की जगह आप कोई अच्छी कहानी या मोटिवेशन की किताब पढ़ सकते हैं। इसके अलावा, 10 मिनट के लिए मेडिटेशन या गहरी सांस लेने वाली (Deep Breathing) एक्सरसाइज करें। कमरे में अंधेरा रखें, नींद अपने आप आएगी।
4. मेरा काम (Job/Business) ही मोबाइल और इंटरनेट से जुड़ा है, तो मैं डिटॉक्स कैसे करूं?
अगर आपका काम फोन से ही चलता है, तो आप इसे 'सिलेक्टिव डिटॉक्स' बना सकते हैं। आप सिर्फ अपने काम वाले ऐप्स (जैसे ईमेल, व्हाट्सएप, बैंक) का इस्तेमाल करें। काम के बीच में या खाली समय में एंटरटेनमेंट वाले ऐप्स (जैसे इंस्टा, यूट्यूब, गेम) खोलने से सख्ती से बचें। काम खत्म होते ही फोन दूर रख दें।
5. क्या फोन की स्क्रीन को ग्रेस्केल (ब्लैक एंड व्हाइट) करने से सच में फायदा होता है?
जी हां, यह मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत ही ज्यादा असरदार है। चमकदार रंग (लाल, नीला) हमारे दिमाग को उत्तेजित करते हैं। बिना रंगों वाली (Black & White) स्क्रीन दिमाग को बहुत ही बोरिंग लगती है, जिससे आपको फोन में मजा नहीं आता और फालतू स्क्रॉलिंग अपने आप कम हो जाती है।
6. जब भी रील देखने का या फोन चेक करने का बहुत तेज मन करे (Craving उठे), तो खुद को कैसे रोकें?
ऐसी स्थिति में '5 सेकंड रूल' (5-Second Rule) का इस्तेमाल करें। जब भी फोन उठाने का तेज मन करे, तो दिमाग में उल्टी गिनती गिनें (5, 4, 3, 2, 1) और उस जगह से तुरंत उठकर कोई और काम करने लगें, जैसे एक गिलास पानी पीना या बालकनी में टहलना। आपकी तलब उसी वक्त टूट जाएगी।
निष्कर्ष (Conclusion): जिंदगी आपकी है, किसी ऐप की नहीं
मोबाइल की लत या रील स्क्रॉलिंग कोई ऐसी लाइलाज बीमारी नहीं है जिसका इलाज न हो सके। यह सिर्फ एक खराब आदत है जिसे बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों ने अपने करोड़ों के फायदे के लिए हमारे दिमाग में चालाकी से प्लांट किया है। रील स्क्रॉलिंग से मिलने वाला डोपामाइन पूरी तरह से नकली (Fake) है। यह आपको असल जिंदगी में न तो खुशी देगा, न पैसा देगा और न ही सफलता दिलाएगा।
आज ही अपने फोन के स्क्रीन टाइम को ट्रैक करना शुरू करें, फालतू ऐप्स के नोटिफिकेशन्स हमेशा के लिए बंद करें और इस 7 दिन के डोपामाइन डिटॉक्स प्लान को पूरी ईमानदारी के साथ शुरू करें। अपनी जिंदगी, अपने सपनों और अपने सबसे कीमती समय का कंट्रोल वापस अपने हाथों में लें। इसे किसी अल्गोरिदम (Algorithm) को तय न करने दें। आप मोबाइल से बहुत बड़े और ताकतवर हैं।
विवेक भाई की एडवाइस (Vivek Bhai Ki Advice)
दोस्तों, मैं खुद भी आप ही की तरह एक ब्लॉगर और वेबसाइट डिजाइनर हूं। मेरा भी पूरा काम (आर्टिकल लिखना, SEO करना) ज्यादातर मोबाइल और इंटरनेट से ही चलता है। एक समय था जब मैं भी अपनी वेबसाइट्स के लिए रिसर्च करने के बहाने यूट्यूब खोलता था और घंटों तक शॉर्ट्स और कॉमेडी रील्स देखता रह जाता था। मेरा काम पेंडिंग पड़ा रहता था, आंखों में दर्द रहने लगा था, और मैं परेशान रहता था कि मेरी वेबसाइट पर ट्रैफिक क्यों नहीं आ रहा है।
फिर एक दिन मुझे समझ आया कि जो स्मार्टफोन मैंने अपने काम को आसान बनाने और पैसे कमाने के लिए खरीदा था, वह मशीन मुझे ही कंट्रोल कर रही है। मेरी आप सभी को यही बड़े भाई वाली सलाह है कि आज एक बार अपने फोन को साइड में रखकर शांति से सोचिए कि जो कीमती समय आप इस 6 इंच की स्क्रीन पर खर्च कर रहे हैं, वह आपको 5 साल बाद जिंदगी में कहां ले जा रहा है? फोन को एक औजार (Tool) की तरह इस्तेमाल कीजिए, उसे अपना मालिक मत बनने दीजिए। शुरुआत के दो-तीन दिन बहुत तकलीफ होगी, उंगलियां अपने आप फोन की तरफ भागेंगी, लेकिन अगर आपने अपने मन पर कंट्रोल कर लिया, तो यकीन मानिए, आपके पास अपने करियर, अपनी वेबसाइट्स, और अपने परिवार के लिए दिन में इतना समय होगा कि आप खुद हैरान रह जाएंगे। आज रात सोने से पहले अपना फोन दूसरे कमरे में रखकर सोएं, और कल सुबह दिमाग की वो गजब की फ्रेशनेस खुद महसूस करें।
